रईस: शाहरुख खान का दमदार अवतार और अपराध-राजनीति की सशक्त कहानी
2017 में रिलीज़ हुई रईस सिर्फ एक गैंगस्टर फिल्म नहीं है, बल्कि यह समाज-व्यवस्था, राजनीति, गरीबी, नैतिकता और इंसानियत से टकराती एक गहरी कथा है। शाहरुख खान ने इस फिल्म में अपने करियर का एक बेहतरीन, सशक्त और भावनात्मक एंटी-हीरो किरदार निभाया है, जो दर्शकों को न सिर्फ प्रभावित करता है बल्कि लंबे समय तक याद भी रह जाता है। यह फिल्म देखने की कई वजहें हैं—इसका शक्तिशाली अभिनय, दमदार संवाद, आकर्षक सिनेमेटोग्राफी, प्रभावशाली कहानी और सामाजिक टिप्पणी—जो इसे आधुनिक हिंदी सिनेमा का एक महत्वपूर्ण अध्याय बनाती हैं।
1. कहानी जो समाज की हकीकत से टकराती है
रईस की कहानी गुजरात के गरीब मोहल्ले से शुरू होती है, जहाँ एक बच्चा अपने हालात, कठिनाइयों और बेबसी से लड़ते-लड़ते बड़ा होता है। रईस आलम (शाहरुख खान) की सोच शुरू से ही अलग है—वह गरीबी को अपनी नियति नहीं मानता और अपनी मेहनत व समझदारी से खुद का रास्ता बनाना चाहता है। उसके गुरु उसे बचपन में एक बात सिखाते हैं: “कोई धंधा छोटा नहीं होता और धंधे से बड़ा कोई धर्म नहीं होता।”
यही विचार रईस की ज़िंदगी की दिशा तय करता है। वह शराबबंदी वाले राज्य गुजरात में तस्करी के कारोबार में उतरता है। समय के साथ वह इस अवैध धंधे में बड़ा नाम बन जाता है। फिल्म में उसकी ऊँचाइयों, गिरावटों, संघर्षों और अपनापन व इंसानियत के बीच चल रहे उसके अंदरूनी टकराव को खूबसूरती से दिखाया गया है।
रईस की कहानी सिर्फ अपराध पर नहीं टिकी है। यह उस मनुष्य की कहानी है जो गलत दुनिया में रहते हुए भी अपनी अंदरूनी नैतिकता बनाए रखता है। वह जनता की मदद करता है, उनकी तकलीफों में साथ खड़ा होता है और अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा समाजसेवा में लगाता है। यही कारण है कि रईस को इलाके में “रॉबिनहुड” जैसी छवि मिलती है।
2. शाहरुख खान का एंटी-हीरो अवतार—फिल्म की रीढ़
शाहरुख खान ने इससे पहले भी कई बार एंटी-हीरो की भूमिका निभाई है—जैसे डर, बाज़ीगर, अंजाम—लेकिन रईस का किरदार उन सब से अलग और कहीं अधिक परिपक्व है।
यह किरदार न तो पूरी तरह बुरा है, न पूरी तरह अच्छा। यह एक ऐसा इंसान है जो गलत रास्तों पर चलता है, लेकिन उसके भीतर सहानुभूति, प्यार, वफादारी और दर्द भी है।
शाहरुख इस किरदार को न सिर्फ अभिनय से बल्कि अपनी आँखों के भाव, आवाज़ की ठहराव और शरीर की भाषा से भी जिंदा कर देते हैं। फिल्म देखते समय दर्शक रईस को दोषी मानते हुए भी उससे नफरत नहीं कर पाते—यह SRK की अदाकारी का सबसे बड़ा प्रमाण है।
3. नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी—फिल्म का मजबूत स्तंभ
फिल्म में नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी IPS ऑफिसर मजुमदार के रूप में हैं—रईस के सबसे बड़े विरोधी।
उनका किरदार दृढ़, ईमानदार और बेहद तेज-तर्रार है। नवाज़ हर सीन में एक अलग तेज़ी, ऊर्जा और तीखापन लेकर आते हैं। उनकी डायलॉग डिलीवरी, कॉमिक टच और गंभीरता—सब बैलेंस में है।
रईस और मजुमदार के बीच की टकराहट फिल्म का सबसे शक्तिशाली पहलू बन जाती है। यह बिल्ली-चूहे का खेल नहीं, बल्कि दो मजबूत व्यक्तित्वों के बीच सम्मानजनक टकराव की कहानी है।
4. महिरा खान और भावनाओं की परतें
पाकिस्तानी अभिनेत्री महिरा खान फिल्म में रईस की प्रेमिका और फिर पत्नी आसिया की भूमिका में हैं।
उनकी सादगी, मासूमियत और रईस के प्रति निस्वार्थ प्रेम कहानी में गर्माहट लाता है।
उनकी केमिस्ट्री शाहरुख खान के साथ बेहद स्वाभाविक और दिल को छूने वाली लगती है।
कोयल-सी मीठी बातचीत, हल्की मुस्कान और परिवार को सँभालने का तरीका आसिया के किरदार को खूबसूरती से गढ़ता है—जो एक गैंगस्टर की संवेदनशील दुनिया को संतुलन देता है।
5. अपराध और राजनीति — दोनों का गहरा संबंध
रईस का सबसे महत्वपूर्ण तत्व है अपराध और राजनीति का यथार्थवादी चित्रण। फिल्म दिखाती है कि कैसे विश्विद्यालय, गरीब बस्तियाँ, बाजार, मज़दूर और पार्टी ऑफिस—all एक ही सिस्टम से जुड़े होते हैं जिसे अपराध और राजनीति दोनों संचालित करते हैं।
रईस जैसे लोगों का उपयोग चुनावों में वोट बटोरने के लिए किया जाता है। नेता उसका इस्तेमाल करते हैं, उसे आगे बढ़ाते हैं, और जब वह बहुत बड़ा हो जाता है तो वही नेता उससे डरने लगते हैं। यह चक्र वास्तविक भारतीय राजनीति का सटीक चित्रण है।
फिल्म यह भी दिखाती है कि—
कानून हमेशा सख्त नहीं होता
राजनीति हमेशा साफ नहीं होती
अपराध हमेशा अमानवीय नहीं होता
कई बार अच्छाई-बुराई की रेखाएँ धुंधली हो जाती हैं।
6. दमदार संवाद—फिल्म की आत्मा
फिल्म में कई संवाद ऐसे हैं जो सीधे दिल पर असर करते हैं:
“मैं धंधा करता हूँ, मैं धर्म का धंधा नहीं करता।”
“बनिए का दिमाग और मियाँ भाई की डर...”
“कोई धंधा छोटा नहीं होता।”
ये संवाद न सिर्फ मनोरंजक हैं, बल्कि किरदार की मनोवृत्ति को गहराई से व्यक्त करते हैं।
7. शानदार निर्देशन और सिनेमेटोग्राफी
निर्देशक राहुल ढोलकिया फिल्म को एक प्रामाणिक सामाजिक पृष्ठभूमि पर रखते हैं—गुजरात का कालाबाजारी, शराबबंदी, राजनीति, सामुदायिक जीवन, त्योहार और भावनाएँ सब कुछ इतनी बारीकी से बुना गया है कि दर्शक खुद को उस दुनिया का हिस्सा महसूस करता है।
सिनेमेटोग्राफी भी फिल्म को एक रियल-लुक देती है—पुरानी गलियाँ, संकरी सड़के, छोटे घर, बाजार, गोदाम—सब कुछ नैसर्गिक लगता है।
एक्शन सीन्स तेज़ और प्रभावशाली हैं; वे चरित्र के स्वभाव के अनुरूप हैं—स्टाइलिश नहीं, बल्कि जमीन से जुड़े हुए।
8. संगीत—गुजराती रंग में रंगा
राम संपत का संगीत फिल्म की कहानी के वातावरण को मजबूत बनाता है।
“लैला मैं लैला”, “ऊड़ी ऊड़ी जाए”, “सलाam वालेकुम” जैसे गाने लोकप्रिय हुए और गुजरात की सांस्कृतिक खुशबू को पूरी तरह से पकड़ते हैं।
खासकर ऊड़ी ऊड़ी जाए एक त्योहारगान बन चुका है, चाहे वह नवरात्रि हो या होली।
9. सामाजिक संदेश—सब कुछ धंधा नहीं होता
यद्यपि रईस एक अपराधी है, लेकिन फिल्म यह दिखाती है कि—
अपराध इंसान को बुरा नहीं बनाता
गरीबी और व्यवस्था उसे उस रास्ते पर ले जाती है
इंसानियत का मूल्य हर व्यवस्था से ऊँचा है
रईस का गरीबों के लिए अस्पताल, बच्चों की मदद, हर क्षेत्र के लोगों के प्रति सम्मान उसके मानवीय चेहरे को दर्शाते हैं।
फिल्म का सबसे बड़ी सीख यह है कि सत्ता, धन और शक्ति के खेल में सबसे अधिक नुकसान आम आदमी का ही होता है।
10. क्यों देखनी चाहिए यह फिल्म?
1. शाहरुख खान का अब तक का सबसे दमदार एंटी-हीरो अवतार।
2. नवाज़ुद्दीन जैसे सशक्त अभिनेता के साथ शानदार मुकाबला।
3. अपराध + राजनीति का यथार्थवादी चित्रण।
4. दमदार संवाद और भावपूर्ण कहानी।
5. सामाजिक संदेश और इंसानियत की परतें।
6. गुजरात की संस्कृति, संगीत और लोकेशन का अनोखा संयोजन।
7. भावनाएँ, एक्शन, ड्रामा सब एक ही फिल्म में।
रईस एक ऐसी फिल्म है जहाँ कथानक, विचार, अभिनय और प्रस्तुति मिलकर दर्शकों को गहराई से प्रभावित करते हैं। यह सिर्फ एक मसाला फिल्म नहीं—बल्कि वह दर्पण है
जिसमें समाज, राजनीति और इंसान के संघर्ष साफ-साफ दिखाई देते हैं।
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